मक्का का भूट्टा हूँ मैं
तोड़ना मत अभी कच्चा हूँ मैं।
बच्चे मुझे हाथ लगाते
मंद मंद वे मुस्काते।
मेरी एक भूरी सी दाढ़ी आती
पीले रंग के दाँत दिखाती।
देखो अक्ल का कच्चा हूँ मैं
अध पका भुट्टा हूँ मैं।
किसान मेरी फ़सल उगाते
बच्चें मुझे बड़े चाव से खाते।
हवा चले तब मैं लहराऊँ
मन ही मन फिर इतराऊँ।
किसान मुझे छूकर परखे
पक्का हूँ कि कच्चा हूँ मैं।
तोड़ना मत अभी कच्चा हूँ मैं
मन का बहुत सच्चा हूँ मैं।
चेहरे पर मेरे रंगत आये
हरा दुशाला(परत)जब लहराये।
दूर से देखूँ मैं सबको
अदब से झुक जाऊँ तबतो।
चौड़े चौड़े पत्तों वाली
दाढ़ी मूँछ है मतवाली।
आग में रख मुझे पकाते
नमक लगाकर चाव से खाते।
सब कहते अच्छा हूँ मैं
मक्का का भूट्टा हूँ मैं।
देखो मुझे मत सताना
अभी तो कुछ कच्चा हूँ मैं।
किसान की आँख का तारा
कोई और तोड़े वो नहीं गँवारा।
पक जाऊँ तब कट जाऊँ मैं
तना बने पशुओं का चारा।
अब नहीं कुछ कह पाऊँ मै
अभी तो बस बच्चा हूँ मैं।
मक्के का भूटटा हूँ मैं
तोड़ना मत अभी कच्चा हूँ मैं।
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