एक शहीद का शव सोलह वर्ष तक यों दफ़न था
सियाचिन की बर्फ़ के नीचे वो बिना कफ़न था।
सोया था वो वीर अपनी उन्हीं पुरानी सी यादों में
क़वायद थी उसकी बस उन्हीं सबुरी फरियादों में।
खोजी दल ने आज मशक्कत से उसे ढूँढ निकाला
सोलह वर्ष बाद घरवालों के मनमें हुआ था उजाला।
उसने अपनी वर्दी ज्यों की त्यों बदन पर पहनी थी
लगता था जैसे उसकी ड्यूटि अब भी वहीं लगी थी।
चेहरा चिरनिंद्रा में लग रहा था आज भी उसका
कह रहा था वो जैसे अपने हादसे की पूरी व्यथा।
वक्त देखते ही देखते कितना आगे निकल गया था
पर सोलह वर्ष बाद भी शरीर यथावत मिल गया था।
चेहरा नही बदला था फिरभी वक्त की मार के आगे
वो वहीं पर था पर वक्त ही था जो हर पल दूर भागे।
वर्दी के बूट में जुराब की दिखी वो ठहरी सी अकड़न
नहीं गई थी अब भी वो मौजे की उलझी हुई जकड़न।
रायफल को भी वो यों की यों हाथ में पकड़े हुए था
दूसरे हाथ से वो असलहा के बस्ते को जकड़े हुए था।
सियाचिन की तो ऐसी थी वो तूफ़ानी बर्फ़ीली हवाएँ
देती थी हरवक्त वो किसी वीर सिपाही को बद्दुआएँ।
जो कोई भी गाहे-बगाहे आ गया उनकी गिरफ़्त में
समझो जुड़ गया वो मृत्यु की एकमुश्त फ़ेहरिस्त में।
बस यही सब हुआ होगा कभी इस एहले वीर के साथ
उसने अपनी वर्दी ज्यों की त्यों बदन पर पहनी थी
लगता था जैसे उसकी ड्यूटि अब भी वहीं लगी थी।
चेहरा चिरनिंद्रा में लग रहा था आज भी उसका
कह रहा था वो जैसे अपने हादसे की पूरी व्यथा।
वक्त देखते ही देखते कितना आगे निकल गया था
पर सोलह वर्ष बाद भी शरीर यथावत मिल गया था।
चेहरा नही बदला था फिरभी वक्त की मार के आगे
वो वहीं पर था पर वक्त ही था जो हर पल दूर भागे।
वर्दी के बूट में जुराब की दिखी वो ठहरी सी अकड़न
नहीं गई थी अब भी वो मौजे की उलझी हुई जकड़न।
रायफल को भी वो यों की यों हाथ में पकड़े हुए था
दूसरे हाथ से वो असलहा के बस्ते को जकड़े हुए था।
सियाचिन की तो ऐसी थी वो तूफ़ानी बर्फ़ीली हवाएँ
देती थी हरवक्त वो किसी वीर सिपाही को बद्दुआएँ।
जो कोई भी गाहे-बगाहे आ गया उनकी गिरफ़्त में
समझो जुड़ गया वो मृत्यु की एकमुश्त फ़ेहरिस्त में।
बस यही सब हुआ होगा कभी इस एहले वीर के साथ
दफ़न हुआ पडा था ऐसे जैसे दर्शाता था तब के हालात।
जय हिंद ! वंदेमातरम ! तुझे ऐ भारत माँ के वीर सपूत
दे दिया तूँ ने अपनी सच्ची सेवा का ये ऐसा बडा सबूत।
जय हिंद ! जय हिंद ! जय हिंद ! कहते हैं अब हम तुझे
शहीद हुआ था मातृ भूमि पर मृत पडा था वहाँ तबका
तैनात था कभी वो शरहद पर बजता था उसका डंका।
सोलह वर्ष तक बस खोया पडा रहा वो यों बर्फ़ के नीचे
लम्बे समय तक दफ़न रहा वो यों बर्फ़ की चादर खींचे।
लम्बे समय तक दफ़न रहा वो यों बर्फ़ की चादर खींचे।
जय हिंद ! वंदेमातरम ! तुझे ऐ भारत माँ के वीर सपूत
दे दिया तूँ ने अपनी सच्ची सेवा का ये ऐसा बडा सबूत।
जय हिंद ! जय हिंद ! जय हिंद ! कहते हैं अब हम तुझे
ऐसा जज़्बा देखकर तेरा करते कोटी-कोटि सलाम तुझे।
No comments:
Post a Comment