Sunday, 19 December 2021

The grasshopper 


The tiny grasshopper jumped 

In a hurry it was a bit scrimped 


A pair of round eyes peeped out

Nice to witness the pretty stout 


It never crashes its jackhammer paws

It suddenly crunched in the corner jaws


It took a sturdy stance for a moment there

To hop for some imminent hidden fear 


It’s long legs rest on the ground 

Just like a teased hungry hound 


Treacherous it looks at times

Scissor like antennas so Devine 


Oh have mercy on the poor hopper 

It is neither an aeroplane or a chopper

Saturday, 16 October 2021

चिड़िया का घोंसला

 

कुछ तिनके उठाकर बार बार ला रही थी
चिड़िया शायद अपना घर बना रही थी।

इस वक्त उसे कुछ और नही सूझ रहा था
पेड़ की शाखा पर वो घोंसला दिख रहा था।

फुर्र से उड़ती और कुछ और तिनके ले आई
बहुत मेहनतकश थी वो पूरा आसमां घूम आई।

चिड़िया थी वो, चौंच के सहारे सब कर लेती
पंख थे उसके ग़ज़ब उनमें वो ढेर हवा भर लेती।

एक नया संसार जो बसाना था उसे इस वक्त
उसे तो फैसला लेना था जो था थोडा सा शक्त।

उड़ जाती थी वो फुर्र से जब चाहती तब वो लौटती
कहीं से दाना चुगती तो कहीं से थोडा सा पानी पीती।

परख परख कर तिनका चोंच में पकड कर आये
एक के बाद दूसरा, तीसरा....तिनका लेकर आये।

लो घोंसला भी बन गया, अब अंडे एक दो,तीन,चार
पल पल उन्हें निहारती, चूज़े लायेंगे घोंसले में बहार।

इसी उधेड़ बुन में वो रह रह कर उड़ कर जा रही थी
चिड़िया अब शायद अपना आसियाना बना रही थी।

रावण का रोल

 एक आदमी रावण का रोल कर रहा था

दस सिरों को उठाकर बोझ मर रहा था

आयोजकों ने उसकी ये परेशानी समझी
पाँच मिनट की लघु शंका की छुट्टी करदी

रावण जी लघु शंका के लिये दीवार के नाल खड गये
कुछ देर बाद पता चला की उसके पीछे कुत्ते पड गये

आनन फ़ानन में उसके नक़ली सिर नीचे लुढ़कने लगे
और कुछ कुत्ते रावण की धोती से खींचतान करने लगे

प्रबंधक अब रावण को इधर उधर ढूँढने लगे
देरी होते देख पब्लिक में से कुछ लोग उँधने लगे

इतनी देर में रावण का वह स्टेज पात्र आ गया
पर्बंधक उसकी माली हालत देख घबरा गया

वो बोला रै रावण तूँ कहाँ मर गया था
नालायक़ तूँ तो लघुशंका करने गया था

बोला श्रीमान, बस अब और कुछ मत पूछो
मेरे बाकि सिर तो वो कुत्ते ले गये उन्हें ढूँढो

मैं तो बड़ी मुश्किल से लौट कर आ पाया हूँ
और ये मेरा असली सिर बचा कर लाया हूँ

मेनेजर बोला चलो नये सिर और पड़े हैं उन्हें पहन लो
कुत्ते तो कुत्ते हैं छोड़ो उन्हें अब ये नये कपडे पहन लो

बच गया मैं नहीं तो बेवजह ही मारा जाता
मैं रावण हूँ ये भी कुत्तों को पता चल जाता

तो वो मेरा असली सिर भी उठा ले जाते
मेरे घरवाले मेरा इंतज़ार करते रह जाते

अरे चलो भी अब तुम्हारा रोल आ गया
दर्शकों में थोड़ी देर को सन्नाटा छा गया

वो बेला भई ये संभालो तुम्हारा तामझाम
मैं तो करूँगा अब अपने ही घर का काम

तुम तो जरा सी बात पर बस यों ही घबरा गये
क्या हो गया, कुत्ते कौनसा असली सिर खा गये

तुम तो जनता के सामने बच्चों की तरह शर्मा गये
अरे ! इधर देखो, तुम्हारे लिए नये नो सिर आ गये

मेनेजर के कहने पर वो मान गया
रावण बनने का मतलब जान गया

अगले दिन से वो डरता हुआ सा आया
अब उसे रावण का मतलब समझ आया

Friday, 15 October 2021

जिंदगी एक सफ़र



माना कि जिंदगी का सफ़र है जरा मुश्किल
पर डरना नही है तुम चलते रहना ऐ मुशाफिर।

बढ जाती हैं अकसर धड़कन इस सफ़र में
ऐ वक्त तूँ ही बता अब क्या करें गफ़लत में।

जान जाइये इस जीवन की ये काँटों भरी राह
ये जीवन तो समझ लीजिये है समंदर अथाह।

यों मनुष्य कभी लड़खड़ाता कभी चलता भी है
ये दौड़ता है कभी कभी फिर ये सरकता भी है।

मान मत लेना इसे बस सफ़र एक मात्र बेचारा
पूरा ज़रूर करना इसे तुम, ये तो है बहुत प्यारा।

वक्त काट देता है जिंदगी के इस सफ़र को
विश्वास रखो अपने ऊपर, इसे ग़ौर से देखो।

ऐ मुसाफ़िर जिंदगी के इस सफ़र में तूँ चलते रहना
समझ लो ये सफ़र तो है जिंदगी का बस एक गहना।

चलो, सफ़र है ये तो जैसे तैसे बस कट ही जायेगा
पर जरा सोच ऐ मनुष्य अब तूँ किस राह पर जायेगा।

वैमनस्य मत रखना जिंदगी के सफ़र में तूँ कभी
बस अच्छी सोच रखना निकले तूँ चाहे जिधर भी।

आहट पाकर तूँ किसी की, डर न जाना मेरे भाई
लोग मिलेंगे तुझे इस सफ़र में, ढूँढना तूँ अच्छाई।

बैठ न जाना तुम कभी इस सफर में कभी हार मानकर
राहें बहुत कठिन आयेंगी हैरत होगी तुम्हें ये जानकर।

Tuesday, 5 October 2021

शहीद का शव



 

एक शहीद का शव सोलह वर्ष तक यों दफ़न था
सियाचिन की बर्फ़ के नीचे वो बिना कफ़न था।

सोया था वो वीर अपनी उन्हीं पुरानी सी यादों में
क़वायद थी उसकी बस उन्हीं सबुरी फरियादों में।

खोजी दल ने आज मशक्कत से उसे ढूँढ निकाला















सोलह वर्ष बाद घरवालों के मनमें हुआ था उजाला।

उसने अपनी वर्दी ज्यों की त्यों बदन पर पहनी थी
लगता था जैसे उसकी ड्यूटि अब भी वहीं लगी थी।

चेहरा चिरनिंद्रा में लग रहा था आज भी उसका
कह रहा था वो जैसे अपने हादसे की पूरी व्यथा।

वक्त देखते ही देखते कितना आगे निकल गया था
पर सोलह वर्ष बाद भी शरीर यथावत मिल गया था।

चेहरा नही बदला था फिरभी वक्त की मार के आगे
वो वहीं पर था पर वक्त ही था जो हर पल दूर भागे।

वर्दी के बूट में जुराब की दिखी वो ठहरी सी अकड़न
नहीं गई थी अब भी वो मौजे की उलझी हुई जकड़न।

रायफल को भी वो यों की यों हाथ में पकड़े हुए था
दूसरे हाथ से वो असलहा के बस्ते को जकड़े हुए था।

सियाचिन की तो ऐसी थी वो तूफ़ानी बर्फ़ीली हवाएँ
देती थी हरवक्त वो किसी वीर सिपाही को बद्दुआएँ।

जो कोई भी गाहे-बगाहे  गया  उनकी गिरफ़्त में
समझो जुड़ गया वो मृत्यु की एकमुश्त फ़ेहरिस्त में।

बस यही ब हुआ होगा कभी इस एहले वीर के साथ
दफ़न हुआ पडा था ऐसे जैसे दर्शाता था तब के हालात।

शहीद हुआ था मातृ भूमि पर मृत पडा था वहाँ तबका
तैनात था कभी वो शरहद पर बजता था उसका डंका।

सोलह वर्ष तक बस खोया पडा रहा वो यों बर्फ़ के नीचे
लम्बे समय तक दफ़न रहा वो यों बर्फ़ की चादर खींचे।

जय हिंद ! वंदेमातरमतुझे  भारत माँ के वीर सपूत
दे दिया तूँ ने अपनी सच्ची सेवा का ये ऐसा बडा सबूत।

जय हिंद ! जय हिंद ! जय हिंद ! कहते हैं अब  तुझे
ऐसा जज़्बा देखकर तेरा ते कोटी-कोटि सलाम तुझे।











Monday, 4 October 2021

माँ बोली

 

माँ बोली, बच्चों ! अब मैं जाती हूँ

तुम ख़ुश रहना, मैं और नहीं जीना चाहती हूँ ।

 

बस अब और मुझसे कुछ न कहना

प्यार से तुम सब मिलकर रहना।

 

तुम्हारे पापा का एक छोटा सा घर है

बस उसी में रहने का अब तो मन है ।

 

कहते हैं अब मैं अकेला हूँ ,

शमशान में जब से धकेला हूँ ।

 

हम बात करेंगे अपने मन की

सुध बुध रखेंगे अपने तन की ।

 

डरने की ऐसी कोई कोई बात नहीं

कुछ कहे हमें, किसी की औकात नहीं ।

 

दोनों घुमेंगे उन्मुक्त गगन मे

मनमुटाव नहीं होगा कोई मन में ।

 

बादलों की हम सैर करेंगे

लौट आयेंगे हम जब चाहेंगे ।

 

जगह रखी है तुम्हारे लिये

सच कहता हू अब प्रिये ।

 

कुछ ख़ाक बची है, तुम आ जाना

इसी पर अब तुम बस सो जाना ।

 

कलह की कोई बात नहीं होगी

बस प्यार भरी सौगात होगी ।

 

संकोच न करना अब कुछ भी

साथ न लाना तुम कुछ भी ।

 

खेत खलिहान सब छोड़ के आना

बच्चों को ये सब सौंप के आना ।

 

देखो यहाँ हम बहुत सुखी रहेंगे

आपस में तन मन की बात करेंगे 

     

मेरी बात का विशवास करो

अब ना और पश्ताचाप करो ।


संग संग हम रह पायेंगे

कभी जगेंगे कभी सो जायेंगे ।

 

देखो तुम जरा जल्दी आना

बिलकुल भी ना अब घबराना ।

 

चल चलेंगे उड़कर हम दोनों

अपने खेत देखेंगे, और घर दोनों ।

 

 

गाँव की भी दोनों सैर करेंगे

सारे जहाँ का भ्रमण बेपैर करेंगे ।

 

अपना भी एक बड़ा सा धर था

बच्चों का बीता वहीं बचपन था ।

 

उसपर भी हम ग़ौर करेंगे

दोनों मिलकर दौड़ करेंगे ।

 

जोहड (शमशान) ही बस अब अपना है

बाकी सब तो बस एक अब सपना है ।


माँ की बस यही तलब थी

बच्चों से अब वो अलग थी ।

 

थका हुआ वो उसका चेहरा

बस चला ना उस पर मेरा ।

 

चाहत अब सब ख़त्म हुई

आँखें थी अब बस बुझी हुई

 

झुलस गई थी काया उसकी

रही न अब कोई माया उसकी

 

थक गई थी वो, क्या करे बेचारी
सबकी रसोई हो गई थी अब न्यारी



समझ नही रहा था माँ अब कहाँ जाये
रह रह कर अब बस पिताजी याद आये



कहते हैं तुम जल्दी जाओ
ख़ाली हाथ गई थी ख़ाली हाथ जाओ



मैं रोज़ टकटकी लगाये देखता हूँ
तेरे लिये रोज़ यहाँ जगह रोकता हूँ



शायद वो अब सब समझ चुकी थी
घर की चाबी वो बहु को दे चुकी थी