Monday, 4 October 2021

माँ बोली

 

माँ बोली, बच्चों ! अब मैं जाती हूँ

तुम ख़ुश रहना, मैं और नहीं जीना चाहती हूँ ।

 

बस अब और मुझसे कुछ न कहना

प्यार से तुम सब मिलकर रहना।

 

तुम्हारे पापा का एक छोटा सा घर है

बस उसी में रहने का अब तो मन है ।

 

कहते हैं अब मैं अकेला हूँ ,

शमशान में जब से धकेला हूँ ।

 

हम बात करेंगे अपने मन की

सुध बुध रखेंगे अपने तन की ।

 

डरने की ऐसी कोई कोई बात नहीं

कुछ कहे हमें, किसी की औकात नहीं ।

 

दोनों घुमेंगे उन्मुक्त गगन मे

मनमुटाव नहीं होगा कोई मन में ।

 

बादलों की हम सैर करेंगे

लौट आयेंगे हम जब चाहेंगे ।

 

जगह रखी है तुम्हारे लिये

सच कहता हू अब प्रिये ।

 

कुछ ख़ाक बची है, तुम आ जाना

इसी पर अब तुम बस सो जाना ।

 

कलह की कोई बात नहीं होगी

बस प्यार भरी सौगात होगी ।

 

संकोच न करना अब कुछ भी

साथ न लाना तुम कुछ भी ।

 

खेत खलिहान सब छोड़ के आना

बच्चों को ये सब सौंप के आना ।

 

देखो यहाँ हम बहुत सुखी रहेंगे

आपस में तन मन की बात करेंगे 

     

मेरी बात का विशवास करो

अब ना और पश्ताचाप करो ।


संग संग हम रह पायेंगे

कभी जगेंगे कभी सो जायेंगे ।

 

देखो तुम जरा जल्दी आना

बिलकुल भी ना अब घबराना ।

 

चल चलेंगे उड़कर हम दोनों

अपने खेत देखेंगे, और घर दोनों ।

 

 

गाँव की भी दोनों सैर करेंगे

सारे जहाँ का भ्रमण बेपैर करेंगे ।

 

अपना भी एक बड़ा सा धर था

बच्चों का बीता वहीं बचपन था ।

 

उसपर भी हम ग़ौर करेंगे

दोनों मिलकर दौड़ करेंगे ।

 

जोहड (शमशान) ही बस अब अपना है

बाकी सब तो बस एक अब सपना है ।


माँ की बस यही तलब थी

बच्चों से अब वो अलग थी ।

 

थका हुआ वो उसका चेहरा

बस चला ना उस पर मेरा ।

 

चाहत अब सब ख़त्म हुई

आँखें थी अब बस बुझी हुई

 

झुलस गई थी काया उसकी

रही न अब कोई माया उसकी

 

थक गई थी वो, क्या करे बेचारी
सबकी रसोई हो गई थी अब न्यारी



समझ नही रहा था माँ अब कहाँ जाये
रह रह कर अब बस पिताजी याद आये



कहते हैं तुम जल्दी जाओ
ख़ाली हाथ गई थी ख़ाली हाथ जाओ



मैं रोज़ टकटकी लगाये देखता हूँ
तेरे लिये रोज़ यहाँ जगह रोकता हूँ



शायद वो अब सब समझ चुकी थी
घर की चाबी वो बहु को दे चुकी थी

 


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