लगता था उनके दिन लद गए
“क्या हुआ भाई,” पेड़ ने पूछा
पता चला पतझड़ आ गयी
सब को एक साथ निपटा गयी
पत्तों का हुज़ूम लग गया गली कूंचों में
झाड़ू वालों की फ़ौज आ गयी
लगे ढकेलने सूखे पत्तों को
देखते ही देखते मुनिसिपलिटी की वैन आगयी
पेड़ रुआंसा होकर रह गया
वह तो अस्थिपंजर हो गया
चला ज्यों ही हवा का रेला
पेड़ रह गया बिलकुल अकेला
“ये पतझड़ है या कोई शैतान “
पेड़ बोला सीना तान
कहाँ गए वो दिन जब बहार थी
हवा की चलती बयार थी
" पिट गए हम बेवज़ह ", पेड़ बोला
उसने सबके सामने अपना पिटारा खोला
तभी एक और झोका हवा का आया
पेड़ को पुरजोर हिलाया
बचे खुचे पत्ते भी गिर गए
उसके बाल भूत की तरह बिखर गए
अरे ये क्या हुआ भाई
बिना मतलब हज़ामत क्यों बनाई
पेड़ रुआंसा हो गया
फिर जाने कहाँ खो गया
पत्ते अब नीचे पड़े थे
कुछ सूखे कुछ सड़े थे
बोले," उठे हमें बचाओ", जो अधमरे थे
अश्रुपूर्ण हालत में पेड़ के परखचे उड़े थे
नीचे देख रोने लगा
उसके पत्ते आंधी में उड़ गए
कुछ नाली में बह गए
अरे, ये क्या हुआ इन सबको ?
कोई इनका हाल तो पूछो
पेड़ ने दी दुहाई, ये पतझड़ क्यों आयी
हम तो अब नंगे हो गए
ठूंठ से दीखते है यो खड़े
पंछी भी उड़ गए सारे
अब आसमान में दिखेंगे तारे
चाँद भी हसेगा रात को
अब क्या करेंगे बेचारे
दूर दूर तक उड़ते दिखे उनके दुलारे
किसी के पाँव के तले आये
तो चरमराए, हड्डिया टूट गई
पेड़ की दुनियाँ लुट गयी
इस पतझड़ का क्या बिगाड़ा था हमने
जो जुल्म ढाह दिया उसने
निराश पेड़ अब चुप था
रात हुई तो अंधेर घुप था
तभी ! एक भूत आया उधर
बोला, "मैं अपना घर बनाऊंगा इधर "
अट्टहास किया उसने और लटक गया
पेड़ का तो जैसे मन भटक गया
उसने भगवन को हाथ जोड़े
प्रभु ! कृपा करो हमपे थोड़े
ईश्वर ने दृष्टि दौड़ाई, उसकी सुनी दुहाई
बोला वत्स क्यों डरते हो , "रूको थोड़ा,
आगे बसंत आएगी, पत्तो का मिलेगा नया जोड़ा "
पेड़ की जान में जान आयी
अब उसने बसंत की इन्तजार में जिंदगी बिताई
पतझड़ जा चुकी थी
पेड़ की हिमत वापस आ चुकी थी
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