Saturday, 8 May 2021

मन की व्यथा

 हसीन वादियों में रहकर भी

क्यों उदास सा था मेरा दिल
छिपी छिपी सी थी ख़्वाहिशें
मिल सकी थी तय मंज़िल

उलफत भरी ज़िन्दगी में
बेज़ार थी ज़िन्दगी की वो शाम
चाहकर भी कह सके
बस यही ज़िन्दगी का नाम

समन्दर सी गमगीन थी वो
हसीन वादियों के बीच
चुहलबाजिया करती थी
ही था कोई संगीत

हक़ीक़त तो थी यही
कि तल्ख़ सी थी ज़िन्दगी
बस उलफत तो थी,वही सही
मायूस हो,यदि हो कोई दिललगी

आहट थी वहाँ
यकायक चील की परछाईं
धूप की तिरछी किरणें थी छाई
पहाड़ियों की मनमानी थी वहाँ

रह रह कर आती थी याद
सूना पन सता रहा था
कोई सुनता खा फ़रियाद
कहने को तो ज़माना था

आइना दिखाता था कोई
मन था कि मानता था
धकेल देता था
उस ओर जहाँ रहता था अपना कोई

दरवाज़े पर मन के दस्तक हुई
सोचा कौन होगा
मन की गहराइयों से आहट हुई
सूनापन था और कौन होगा

वादियों में एक तिलस्म होता है
कूक सुनती है कोयल की
कोई उनकी गूँज सुनता है
इन्हीं वादियों में क्यों सुनसान था दिल

तभी किसी की सरसराहट सुनाई दी
शायद कोई राहगीर होगा
मन की गुशताकिया थी वो
बस उसके मुताबिक़ ही होगा

चैन से क्यों नहीं बैठता ये
सजाता क्यों नहीं महफ़िल
हसीन वादियों में रहकर भी
क्यों उदास था मेरा दिल


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