पानी की कटोरी रखी थी मुंडेर पर
पंछियो की चोंच डुबाने के लिए
अब ये तो उनकी मर्जी है
पानी पियें, न पियें
उड़ते उड़ते देख लेते है वो हर उस कोने को
रखा हो जहाँ पानी पीने को
बैठ मुंडेर पर यों ही
पानी पीते हैं हमारा मन रखने के लिए
उदार होते है उनके दिल
हमारी इस भावना के लिए
धन्यवाद भी देते है शायद
चोंच उठाते है, कुछ कहने के लिए
शालीनता से उतरते है वो उस कटोरी को देखकर
मैं भी देखता हु उन्हें अहाते से देरतक
कभी ऊपर जाता हूँ, छत पर
रोज़ रखता हूँ पानी इसी तर्ज पर
खुश हो जाता हूँ, उनकी आवाज़ सुनकर
छू लेती है मुझे एक पहेली बनकर
चाहिए उनका वो प्यार भरा अंदाज़
रखते है वो जिसे सहेज कर
आयी नहीं वो छोटी चिड़िया आज, खो गयी हो जैसे
राह देख रहा था में उसकी कबसे
कि वो फुर्र से नीचे उतरी दीवार पर
इधर उधर देखती, क्या ढूँढ रही थी वो मुझे ?
बित्ति भर की थी आसमान की वो परी
पर थी बड़ी अज़ीज़,वो सिरफिरी
चहकती थी पानी पीकर
आगाज़ करती थी ख़ुशी का, बिना फ़िक्र
आना ही उसकी नज़ाकत थी बड़ी
प्रकृति की उपमा है वो
वहीँ किसी का सपना है वो
रहती थी यही कहीं पेड़पर, लगाती गीतों की झड़ी
फुदक फुदक कर, हर पल नाचती थी
छोटे से पंखो से आसमान नापती थी
रत्तीभर भी गुरुर न था , उसमें
रहती थी वो सदैव अपने वश में
पानी रखने का तो इक बहाना था
मझे तो बस उन पंछियो को बुलाना था
देखता था मैं उनका वो रोज़ उतरना
इत्तफाक नहीं था यो उनका वहां से गुजरना
रिश्वत नहीं दी थी मैंने उनको
चाहत थी उनसे बतियाने की
जानने लगे थे वो भी, शायद मुझको
रोज नहीं आते वरना मुझसे मिलने को
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