माँ बोली, बच्चों ! अब मैं जाती हूँ
तुम ख़ुश रहना, मैं और नहीं जीना चाहती हूँ ।
बस अब और मुझसे कुछ न कहना
प्यार से तुम सब मिलकर रहना।
तुम्हारे पापा का एक छोटा सा घर है
बस उसी में रहने का अब तो मन है ।
कहते हैं अब मैं अकेला हूँ ,
शमशान में जब से धकेला हूँ ।
हम बात करेंगे अपने मन की
सुध बुध रखेंगे अपने तन की ।
डरने की ऐसी कोई कोई बात नहीं
कुछ कहे हमें, किसी की औकात नहीं ।
दोनों घुमेंगे उन्मुक्त गगन मे
मनमुटाव नहीं होगा कोई मन में ।
बादलों की हम सैर करेंगे
लौट आयेंगे हम जब चाहेंगे ।
जगह रखी है तुम्हारे लिये
सच कहता हू अब प्रिये ।
कुछ ख़ाक बची है, तुम आ जाना
इसी पर अब तुम बस सो जाना ।
कलह की कोई बात नहीं होगी
बस प्यार भरी सौगात होगी ।
संकोच न करना अब कुछ भी
साथ न लाना तुम कुछ भी ।
खेत खलिहान सब छोड़ के आना
बच्चों को ये सब सौंप के आना ।
देखो यहाँ हम बहुत सुखी रहेंगे
आपस में तन मन की बात करेंगे
।
मेरी बात का विशवास करो
अब ना और पश्ताचाप करो ।
संग संग हम रह पायेंगे
कभी जगेंगे कभी सो जायेंगे ।
देखो तुम जरा जल्दी आना
बिलकुल भी ना अब घबराना ।
चल चलेंगे उड़कर हम दोनों
अपने खेत देखेंगे, और घर दोनों ।
गाँव की भी दोनों सैर करेंगे
सारे जहाँ का भ्रमण बेपैर करेंगे ।
अपना भी एक बड़ा सा धर था
बच्चों का बीता वहीं बचपन था ।
उसपर भी हम ग़ौर करेंगे
दोनों मिलकर दौड़ करेंगे ।
जोहड (शमशान) ही बस अब अपना है
बाकी सब तो बस एक अब सपना है ।
माँ की बस यही तलब थी
बच्चों से अब वो अलग थी ।
थका हुआ वो उसका चेहरा
बस चला ना उस पर मेरा ।
चाहत अब सब ख़त्म हुई
आँखें थी अब
बस बुझी हुई ।
झुलस गई थी काया
उसकी
रही न अब कोई
माया उसकी ।
थक गई थी वो, क्या करे बेचारी
सबकी रसोई हो गई थी अब न्यारी ।
समझ नही आ रहा था माँ अब कहाँ जाये
रह रह कर अब बस पिताजी याद आये ।
कहते हैं तुम जल्दी आ जाओ
ख़ाली हाथ गई थी ख़ाली हाथ आ जाओ ।
मैं रोज़ टकटकी लगाये देखता हूँ
तेरे लिये रोज़ यहाँ जगह रोकता हूँ ।
शायद वो अब सब समझ चुकी थी
घर की चाबी वो बहु को दे चुकी थी ।