Saturday, 2 October 2021

मक्का का भुट्टा

 मक्का का भूट्टा  हूँ मैं

तोड़ना मत अभी कच्चा हूँ मैं।

 

बच्चे मुझे हाथ लगाते

मंद मंद वे मुस्काते।

 

मेरी एक भूरी सी दाढ़ी आती

पीले रंग के दाँत दिखाती।

 

देखो अक्ल का कच्चा हूँ मैं

अध पका भुट्टा हूँ मैं।

 

किसान मेरी फ़सल उगाते

बच्चें मुझे बड़े चाव से खाते।

 

हवा चले तब मैं लहराऊँ

मन ही मन फिर इतराऊँ।

 

किसान मुझे छूकर परखे

पक्का हूँ कि कच्चा हूँ मैं।

 

तोड़ना मत अभी कच्चा हूँ मैं

मन का बहुत सच्चा हूँ मैं।

 

चेहरे पर मेरे रंगत आये

हरा दुशाला(परत)जब लहराये।

 

दूर से देखूँ मैं सबको

अदब से झुक जाऊँ तबतो।

 

चौड़े चौड़े पत्तों वाली

दाढ़ी मूँछ है मतवाली।

 

आग में रख मुझे पकाते

नमक लगाकर चाव से खाते।

 

सब कहते अच्छा हूँ मैं

मक्का का भूट्टा हूँ मैं।

 

देखो मुझे मत सताना

अभी तो कुछ कच्चा हूँ मैं।

 

किसान की आँख का तारा

कोई और तोड़े वो नहीं गँवारा।

 

पक जाऊँ तब कट जाऊँ मैं

तना बने पशुओं का चारा।

 

अब नहीं कुछ कह पाऊँ मै

अभी तो बस बच्चा हूँ मैं।

 

मक्के का भूटटा हूँ मैं

तोड़ना मत अभी कच्चा हूँ मैं।

Tuesday, 11 May 2021

पतझड़


 पत्ते झड़ कर गिर गए

लगता था उनके दिन लद गए

“क्या हुआ भाई,” पेड़ ने पूछा

पता चला पतझड़ गयी

सब को एक साथ निपटा गयी

 

पत्तों का हुज़ूम लग गया गली कूंचों में

झाड़ू वालों की फ़ौज गयी

लगे ढकेलने सूखे पत्तों को

देखते ही देखते मुनिसिपलिटी की वैन आगयी

 

पेड़ रुआंसा होकर रह गया

वह तो अस्थिपंजर  हो गया

चला ज्यों ही हवा का  रेला

पेड़ रह गया बिलकुल अकेला

 

“ये पतझड़ है या कोई शैतान

पेड़ बोला सीना तान

कहाँ  गए वो दिन जब बहार थी

हवा की चलती बयार थी

 

" पिट गए हम बेवज़ह ", पेड़ बोला

उसने सबके सामने अपना पिटारा खोला

तभी एक और झोका हवा का आया

पेड़ को पुरजोर हिलाया

 

बचे खुचे पत्ते भी गिर गए

उसके बाल भूत की तरह बिखर गए 

अरे ये क्या हुआ भाई

बिना मतलब हज़ामत क्यों बनाई

 

पेड़ रुआंसा हो गया

फिर जाने कहाँ खो गया

पत्ते अब नीचे पड़े थे

कुछ सूखे कुछ सड़े थे

 

बोले," उठे हमें बचाओ", जो अधमरे थे

अश्रुपूर्ण हालत में पेड़ के परखचे उड़े थे

नीचे देख रोने लगा

उसके पत्ते आंधी में उड़ गए

कुछ नाली में बह गए

 

अरे, ये क्या हुआ इन सबको ?

कोई इनका हाल तो पूछो

पेड़ ने दी दुहाई, ये पतझड़ क्यों आयी

हम तो अब नंगे हो गए

ठूंठ से दीखते है यो खड़े

 

पंछी भी उड़ गए सारे

अब आसमान में दिखेंगे तारे

चाँद भी हसेगा रात को

अब क्या करेंगे बेचारे

 

दूर दूर तक उड़ते दिखे उनके दुलारे

किसी के पाँव के तले आये

तो चरमराए, हड्डिया टूट गई

पेड़ की दुनियाँ लुट गयी

 

इस पतझड़ का क्या बिगाड़ा था हमने

जो जुल्म ढाह दिया उसने

निराश पेड़ अब चुप था

रात हुई तो अंधेर घुप था 

 

तभी ! एक भूत आया उधर

बोला, "मैं अपना घर बनाऊंगा इधर "

अट्टहास किया उसने और लटक गया

पेड़ का तो जैसे मन भटक गया

 

उसने भगवन को हाथ जोड़े

प्रभु ! कृपा करो हमपे थोड़े

ईश्वर ने दृष्टि दौड़ाई, उसकी सुनी दुहाई

बोला वत्स क्यों डरते हो , "रूको थोड़ा,

आगे बसंत आएगी, पत्तो का मिलेगा नया जोड़ा "

 

पेड़ की जान में जान आयी

अब उसने बसंत की इन्तजार में जिंदगी बिताई

पतझड़ जा चुकी थी

पेड़ की हिमत वापस चुकी थी 

 


Sunday, 9 May 2021

कागज - कलम


 कागज कलम से लिखा करते थे

स्याही और दवात हुआ करते थे

सूखने के इन्तजार में मिटटी दाल दिया करते थे

सरकंडे की कलम बनाकर दिन रात लिखा करते थे

 

धीरे धीरे होल्डर आया

सोचा  बदल गयी काया

फाउंटेन पेन की मिली सौगात

भूल गए सब अपनी औकात

कुर्ते की जेब में रखकर तब

कुछ अलग दिखा करते थे

 

लिख देना ही कोई बात नहीं है

क्या लिखा है वो बात सही है

ताकत कलम की इतनी होती

अंग्रेजों की ढीली करदी धोती

 

मुख पत्र में यदि लिख दिया

समझो अपना नाम कर दिया

लेखनी चाहे कोई भी हो

शुद्ध विचार हुआ करते थे

कागज कलम से लिखा करते थे

 

अब बदला जमाना इतना

कम्प्यूटर में इंटरनेट गया

सबको इतना भा गया

गूगल और  फेस बुक पर लिखना

आसान तरीका   गया

 

-बुक   के जरिए  घर बैठे आज

इंसान जगत में छा गया

घर में रहकर दफ्तर का काम

बच्चों ने कर दिया मोबाइल से नाम

 

गूगल इंजन सर्च करेगा

जो चाहो वो मिलेगा

ग्लोबल हो गया इंसान

लिखना हो गया आसान

 

खड़िया से शयामपट पर लिखकर

शिक्षक पढ़ाते थे अक्सर

 अपना काम किया करते थे

कागज कलम से लिखा करते थे

 

इतने कम साधन फिर भी

महाकाव्य लिखा करते थे

नदी के किनारे बैठकर

रामायण और महाभारत लिखे

गध और पध में रचना करते दिखे

 

संशाधन के आभाव में भी

वाद विवाद किया करते थे

मौखिक संवाद हुआ करते थे

आता  नहीं था कुछ ज्यादा

फिर भी उत्तम विचार हुआ करते थे

तुलसी दास और कालिदास सरीखे

विद्वान कलम से लिखा करते थे

 

उस  लिखने का सार अधिक था

सदा जीवन और सत्कार अधिक था

कागज  कलम का वो लेखन

सर्वश्रेष्ठ हुआ करते थे

आधुनिकता ने सब कुछ बदला

कागज कलम हो गया अबला

इंटरनेट से लिखना पढ़ना

समझो हो गया अपना

 

देश विदेश में पढ़ा करे अब

हवाई जहाज से सफ़र करे सब

 नौजवान हट्टे कट्टे हुआ करते थे

  कागज कलम से लिखा करते थे