कुछ तिनके उठाकर बार बार ला रही थी
चिड़िया शायद अपना घर बना रही थी।
इस वक्त उसे कुछ और नही सूझ रहा था
पेड़ की शाखा पर वो घोंसला दिख रहा था।
फुर्र से उड़ती और कुछ और तिनके ले आई
बहुत मेहनतकश थी वो पूरा आसमां घूम आई।
चिड़िया थी वो, चौंच के सहारे सब कर लेती
पंख थे उसके ग़ज़ब उनमें वो ढेर हवा भर लेती।
एक नया संसार जो बसाना था उसे इस वक्त
उसे तो फैसला लेना था जो था थोडा सा शक्त।
उड़ जाती थी वो फुर्र से जब चाहती तब वो लौटती
कहीं से दाना चुगती तो कहीं से थोडा सा पानी पीती।
परख परख कर तिनका चोंच में पकड कर आये
एक के बाद दूसरा, तीसरा....तिनका लेकर आये।
लो घोंसला भी बन गया, अब अंडे एक दो,तीन,चार
पल पल उन्हें निहारती, चूज़े लायेंगे घोंसले में बहार।
इसी उधेड़ बुन में वो रह रह कर उड़ कर जा रही थी
चिड़िया अब शायद अपना आसियाना बना रही थी।