Tuesday, 5 October 2021

शहीद का शव



 

एक शहीद का शव सोलह वर्ष तक यों दफ़न था
सियाचिन की बर्फ़ के नीचे वो बिना कफ़न था।

सोया था वो वीर अपनी उन्हीं पुरानी सी यादों में
क़वायद थी उसकी बस उन्हीं सबुरी फरियादों में।

खोजी दल ने आज मशक्कत से उसे ढूँढ निकाला















सोलह वर्ष बाद घरवालों के मनमें हुआ था उजाला।

उसने अपनी वर्दी ज्यों की त्यों बदन पर पहनी थी
लगता था जैसे उसकी ड्यूटि अब भी वहीं लगी थी।

चेहरा चिरनिंद्रा में लग रहा था आज भी उसका
कह रहा था वो जैसे अपने हादसे की पूरी व्यथा।

वक्त देखते ही देखते कितना आगे निकल गया था
पर सोलह वर्ष बाद भी शरीर यथावत मिल गया था।

चेहरा नही बदला था फिरभी वक्त की मार के आगे
वो वहीं पर था पर वक्त ही था जो हर पल दूर भागे।

वर्दी के बूट में जुराब की दिखी वो ठहरी सी अकड़न
नहीं गई थी अब भी वो मौजे की उलझी हुई जकड़न।

रायफल को भी वो यों की यों हाथ में पकड़े हुए था
दूसरे हाथ से वो असलहा के बस्ते को जकड़े हुए था।

सियाचिन की तो ऐसी थी वो तूफ़ानी बर्फ़ीली हवाएँ
देती थी हरवक्त वो किसी वीर सिपाही को बद्दुआएँ।

जो कोई भी गाहे-बगाहे  गया  उनकी गिरफ़्त में
समझो जुड़ गया वो मृत्यु की एकमुश्त फ़ेहरिस्त में।

बस यही ब हुआ होगा कभी इस एहले वीर के साथ
दफ़न हुआ पडा था ऐसे जैसे दर्शाता था तब के हालात।

शहीद हुआ था मातृ भूमि पर मृत पडा था वहाँ तबका
तैनात था कभी वो शरहद पर बजता था उसका डंका।

सोलह वर्ष तक बस खोया पडा रहा वो यों बर्फ़ के नीचे
लम्बे समय तक दफ़न रहा वो यों बर्फ़ की चादर खींचे।

जय हिंद ! वंदेमातरमतुझे  भारत माँ के वीर सपूत
दे दिया तूँ ने अपनी सच्ची सेवा का ये ऐसा बडा सबूत।

जय हिंद ! जय हिंद ! जय हिंद ! कहते हैं अब  तुझे
ऐसा जज़्बा देखकर तेरा ते कोटी-कोटि सलाम तुझे।











Monday, 4 October 2021

माँ बोली

 

माँ बोली, बच्चों ! अब मैं जाती हूँ

तुम ख़ुश रहना, मैं और नहीं जीना चाहती हूँ ।

 

बस अब और मुझसे कुछ न कहना

प्यार से तुम सब मिलकर रहना।

 

तुम्हारे पापा का एक छोटा सा घर है

बस उसी में रहने का अब तो मन है ।

 

कहते हैं अब मैं अकेला हूँ ,

शमशान में जब से धकेला हूँ ।

 

हम बात करेंगे अपने मन की

सुध बुध रखेंगे अपने तन की ।

 

डरने की ऐसी कोई कोई बात नहीं

कुछ कहे हमें, किसी की औकात नहीं ।

 

दोनों घुमेंगे उन्मुक्त गगन मे

मनमुटाव नहीं होगा कोई मन में ।

 

बादलों की हम सैर करेंगे

लौट आयेंगे हम जब चाहेंगे ।

 

जगह रखी है तुम्हारे लिये

सच कहता हू अब प्रिये ।

 

कुछ ख़ाक बची है, तुम आ जाना

इसी पर अब तुम बस सो जाना ।

 

कलह की कोई बात नहीं होगी

बस प्यार भरी सौगात होगी ।

 

संकोच न करना अब कुछ भी

साथ न लाना तुम कुछ भी ।

 

खेत खलिहान सब छोड़ के आना

बच्चों को ये सब सौंप के आना ।

 

देखो यहाँ हम बहुत सुखी रहेंगे

आपस में तन मन की बात करेंगे 

     

मेरी बात का विशवास करो

अब ना और पश्ताचाप करो ।


संग संग हम रह पायेंगे

कभी जगेंगे कभी सो जायेंगे ।

 

देखो तुम जरा जल्दी आना

बिलकुल भी ना अब घबराना ।

 

चल चलेंगे उड़कर हम दोनों

अपने खेत देखेंगे, और घर दोनों ।

 

 

गाँव की भी दोनों सैर करेंगे

सारे जहाँ का भ्रमण बेपैर करेंगे ।

 

अपना भी एक बड़ा सा धर था

बच्चों का बीता वहीं बचपन था ।

 

उसपर भी हम ग़ौर करेंगे

दोनों मिलकर दौड़ करेंगे ।

 

जोहड (शमशान) ही बस अब अपना है

बाकी सब तो बस एक अब सपना है ।


माँ की बस यही तलब थी

बच्चों से अब वो अलग थी ।

 

थका हुआ वो उसका चेहरा

बस चला ना उस पर मेरा ।

 

चाहत अब सब ख़त्म हुई

आँखें थी अब बस बुझी हुई

 

झुलस गई थी काया उसकी

रही न अब कोई माया उसकी

 

थक गई थी वो, क्या करे बेचारी
सबकी रसोई हो गई थी अब न्यारी



समझ नही रहा था माँ अब कहाँ जाये
रह रह कर अब बस पिताजी याद आये



कहते हैं तुम जल्दी जाओ
ख़ाली हाथ गई थी ख़ाली हाथ जाओ



मैं रोज़ टकटकी लगाये देखता हूँ
तेरे लिये रोज़ यहाँ जगह रोकता हूँ



शायद वो अब सब समझ चुकी थी
घर की चाबी वो बहु को दे चुकी थी

 


Sunday, 3 October 2021

देश के प्रति सजग

क्या हम अपना कर्तव्य निभायेंगे ?
देश के लिये खुलकर आ पायेंगे।

क़र्ज़ तले दबी पड़ी भारत माता
फिर क्यों नही हरकोई सामने आता।

खुद-ब-ख़ुद लुटते हैं हम सब लोग
ये सुनियोजित होता है, न कि संजोग।

कब से दर्द सहती ये भारत माता
पर हर कोई बस यही गीत गाता।

भारत माता की जय, बस जय
काफ़ि नही है ये तभी तो होती है पराजय।

आओ कुछ जत्न करें हम सब
भारतमाता के पर्ति हो जायें सजग।

फ़िरंगी आये लूट कर चले गये
और हम सब बस देखते रह गये।

क्या हम देश के पृति सजग रहे
या फिर बस यही दोहराते गये।

भारत माता की जय, बस जय
काफ़ि नही है ये तभी तो होती है पराजय।

मिलकर लड़ने की फ़क़त ज़रूरत है
हर मुसीबत से झूझने की ज़रूरत है।

क़दम से क़दम मिलाना होगा
देश का सम्मान बढ़ाना होगा ।

मिलकर रहने की बजाय बँट जाते है
कुछ लोग फिर धड़ल्ले से छँट जाते हैं।

समय यों ही निकलता जायेगा
देश तो सकते में आता जायेगा।

क्या इंसान अपना वचन निभायेगा
और देश के लिये खुलकर आ पायेगा।

शाम,दाम,दंड भेद सब अपनाते हैं आज
क्यों नही बचा पाते हैं भारत माँ की लाज ?

अनिष्ट होते रहते हैं और हम सहते हैं
खड्ग उठाने का समय अब आ गया है।

क्या हम अपना वचन निभायेंगे
देश के लिये खुलकर आ पायेंगे।