चल देती है यों यदा कदा
ओधड के आगे यों बाल बिखेर
चली आती हैं दौड़ी सुबह सबेर।
क्या दुख है तुझे, चल बता मुझे
दिनभर तूँ काम न करे, सब पूछे
कभी कभी तो तूँ सुबह शाम चले
मन मौजी है तूँ , कहते हैं मनचले।
माना कि तूँ चलती है उष्ण तटीय
सोती है तूँ यहाँ वहाँ बिन तकिये
कांवड़िये रूक जाते है आता जान तुझे
हिला दे उनकी कांवड जाने क्या सूझे।
रात दिन नही समझती है तूँ
चल देती है बिन बताये क्यों
शमशान की तूँ राख उड़ाये
मुर्दों की भी क्यों नींद भगाये।
आकाश में छाये बादल यों भागे
जैसे भागे चौर पुलिस के आगे
साँय साँय की आवाज तूँ करती
कालबेलिये की बीन जैसे फिरती।
बवंडर की तरह तोड़ फोड़ मचाये
जब चाहे तब तूँ मूँह उठा कर आये
सबकी अकल ठिकाने लगाती है क्यों
आनन फ़ानन में जब भी आती है यों।
तूझे इमान नहीं है किसी का
ऐ हवा बता तूँ बावरी है क्या ?
राम भरोसे बस रहते हैं सब
जब भी दिखाये तूँ ये करतब।
उल्फ़त ये तेरी कम नही है
हलके हल्के चले तो ग़म नहीं है
सिंहनाद करके सबको चौंकाती
अलख निरंजन भी तूँ कर जाती।
ये कोई बात सराहनीय है क्या
ऐ हवा बता तूँ बावरी है क्या ?
नाचती गाती जब भी तूँ आती
कभी सरस तो कभी तमतमाती।
जब चाहे तूँ रहे गुनगुनाती
लगता है शायद तूँ शर्माती
रंगीन नहीं है साँवरी है क्या
ऐ हवा, तूँ बावरी है क्या ?