Sunday, 3 October 2021

बावरी हवा


ऐ हवा, तूँ बावरी है क्या ?
चल देती है यों यदा कदा
ओधड के आगे यों बाल बिखेर
चली आती हैं दौड़ी सुबह सबेर।

क्या दुख है तुझे, चल बता मुझे
दिनभर तूँ काम न करे, सब पूछे
कभी कभी तो तूँ सुबह शाम चले
मन मौजी है तूँ , कहते हैं मनचले।

माना कि तूँ चलती है उष्ण तटीय
सोती है तूँ यहाँ वहाँ बिन तकिये
कांवड़िये रूक जाते है आता जान तुझे
हिला दे उनकी कांवड जाने क्या सूझे।

रात दिन नही समझती है तूँ
चल देती है बिन बताये क्यों
शमशान की तूँ राख उड़ाये
मुर्दों की भी क्यों नींद भगाये।

आकाश में छाये बादल यों भागे
जैसे भागे चौर पुलिस के आगे
साँय साँय की आवाज तूँ करती
कालबेलिये की बीन जैसे फिरती।

बवंडर की तरह तोड़ फोड़ मचाये
जब चाहे तब तूँ मूँह उठा कर आये
सबकी अकल ठिकाने लगाती है क्यों
आनन फ़ानन में जब भी आती है यों।

तूझे इमान नहीं है किसी का
ऐ हवा बता तूँ बावरी है क्या ?
राम भरोसे बस रहते हैं सब
जब भी दिखाये तूँ ये करतब।

उल्फ़त ये तेरी कम नही है
हलके हल्के चले तो ग़म नहीं है
सिंहनाद करके सबको चौंकाती
अलख निरंजन भी तूँ कर जाती।

ये कोई बात सराहनीय है क्या
ऐ हवा बता तूँ बावरी है क्या ?
नाचती गाती जब भी तूँ आती
कभी सरस तो कभी तमतमाती।

जब चाहे तूँ रहे गुनगुनाती
लगता है शायद तूँ शर्माती
रंगीन नहीं है साँवरी है क्या
ऐ हवा, तूँ बावरी है क्या ?

Saturday, 2 October 2021

भारत के दो सच्चे सपूत

2 अक्तूबर के दिन जन्मे

भारत के थे वो अभिन्न अंग।
एक थे गांधी लकूटि संग
आधी धोती था श्वेत रंग।


एक थे लाल बहादुर बृजवासी
नाटी सी थी उनकी क़द काठी।

दोनों थे भारत के सच्चे सपूत
क्या वर्तमान और फिर क्या भूत।

सच्चे थे और अच्छे भी थे वो
अपने प्रण के बडे पकके थे वो।

ठान लिया था कुछ काम करेंगे
विश्वभर मे देश का नाम करेंगे।

एक ने अंग्रेज़ों को ललकारा
अहिंसा का सबको दिया नारा।

अंतरिम संकट को पहचाना
बुन दिया सुदृढ ताना बाना।

बुनियादी ढाँचा मज़बूत किया
गांधी बापू का उप नाम दिया।

महात्मा भी वो थे कहलाये
संपूर्ण जगत में फिर वो छाये।

लाल बहादुर की उपमा देकर
अच्छे अच्छे भी थे अब थर्राये।

महिमा थी उनकी ऐसी कुछ
थे वो कुछ करने के इच्छुक।

सच्चाई से मुख ना मोड़ो
अंग्रेज़ों अब भारत छोड़ो।

सचमुच थे वो बडे महान
जय जवान जय किसान।

यादें जुड़ी हैं दोनों के संग
भारत के थे वो अभिन्न अंग।

मक्का का भुट्टा

 मक्का का भूट्टा  हूँ मैं

तोड़ना मत अभी कच्चा हूँ मैं।

 

बच्चे मुझे हाथ लगाते

मंद मंद वे मुस्काते।

 

मेरी एक भूरी सी दाढ़ी आती

पीले रंग के दाँत दिखाती।

 

देखो अक्ल का कच्चा हूँ मैं

अध पका भुट्टा हूँ मैं।

 

किसान मेरी फ़सल उगाते

बच्चें मुझे बड़े चाव से खाते।

 

हवा चले तब मैं लहराऊँ

मन ही मन फिर इतराऊँ।

 

किसान मुझे छूकर परखे

पक्का हूँ कि कच्चा हूँ मैं।

 

तोड़ना मत अभी कच्चा हूँ मैं

मन का बहुत सच्चा हूँ मैं।

 

चेहरे पर मेरे रंगत आये

हरा दुशाला(परत)जब लहराये।

 

दूर से देखूँ मैं सबको

अदब से झुक जाऊँ तबतो।

 

चौड़े चौड़े पत्तों वाली

दाढ़ी मूँछ है मतवाली।

 

आग में रख मुझे पकाते

नमक लगाकर चाव से खाते।

 

सब कहते अच्छा हूँ मैं

मक्का का भूट्टा हूँ मैं।

 

देखो मुझे मत सताना

अभी तो कुछ कच्चा हूँ मैं।

 

किसान की आँख का तारा

कोई और तोड़े वो नहीं गँवारा।

 

पक जाऊँ तब कट जाऊँ मैं

तना बने पशुओं का चारा।

 

अब नहीं कुछ कह पाऊँ मै

अभी तो बस बच्चा हूँ मैं।

 

मक्के का भूटटा हूँ मैं

तोड़ना मत अभी कच्चा हूँ मैं।