क्या हम अपना कर्तव्य निभायेंगे ?
देश के लिये खुलकर आ पायेंगे।
देश के लिये खुलकर आ पायेंगे।
क़र्ज़ तले दबी पड़ी भारत माता
फिर क्यों नही हरकोई सामने आता।
खुद-ब-ख़ुद लुटते हैं हम सब लोग
ये सुनियोजित होता है, न कि संजोग।
कब से दर्द सहती ये भारत माता
पर हर कोई बस यही गीत गाता।
भारत माता की जय, बस जय
काफ़ि नही है ये तभी तो होती है पराजय।
आओ कुछ जत्न करें हम सब
भारतमाता के पर्ति हो जायें सजग।
फ़िरंगी आये लूट कर चले गये
और हम सब बस देखते रह गये।
क्या हम देश के पृति सजग रहे
या फिर बस यही दोहराते गये।
भारत माता की जय, बस जय
काफ़ि नही है ये तभी तो होती है पराजय।
मिलकर लड़ने की फ़क़त ज़रूरत है
हर मुसीबत से झूझने की ज़रूरत है।
क़दम से क़दम मिलाना होगा
देश का सम्मान बढ़ाना होगा ।
मिलकर रहने की बजाय बँट जाते है
कुछ लोग फिर धड़ल्ले से छँट जाते हैं।
समय यों ही निकलता जायेगा
देश तो सकते में आता जायेगा।
क्या इंसान अपना वचन निभायेगा
और देश के लिये खुलकर आ पायेगा।
शाम,दाम,दंड भेद सब अपनाते हैं आज
क्यों नही बचा पाते हैं भारत माँ की लाज ?
अनिष्ट होते रहते हैं और हम सहते हैं
खड्ग उठाने का समय अब आ गया है।
क्या हम अपना वचन निभायेंगे
देश के लिये खुलकर आ पायेंगे।