Sunday, 3 October 2021

देश के प्रति सजग

क्या हम अपना कर्तव्य निभायेंगे ?
देश के लिये खुलकर आ पायेंगे।

क़र्ज़ तले दबी पड़ी भारत माता
फिर क्यों नही हरकोई सामने आता।

खुद-ब-ख़ुद लुटते हैं हम सब लोग
ये सुनियोजित होता है, न कि संजोग।

कब से दर्द सहती ये भारत माता
पर हर कोई बस यही गीत गाता।

भारत माता की जय, बस जय
काफ़ि नही है ये तभी तो होती है पराजय।

आओ कुछ जत्न करें हम सब
भारतमाता के पर्ति हो जायें सजग।

फ़िरंगी आये लूट कर चले गये
और हम सब बस देखते रह गये।

क्या हम देश के पृति सजग रहे
या फिर बस यही दोहराते गये।

भारत माता की जय, बस जय
काफ़ि नही है ये तभी तो होती है पराजय।

मिलकर लड़ने की फ़क़त ज़रूरत है
हर मुसीबत से झूझने की ज़रूरत है।

क़दम से क़दम मिलाना होगा
देश का सम्मान बढ़ाना होगा ।

मिलकर रहने की बजाय बँट जाते है
कुछ लोग फिर धड़ल्ले से छँट जाते हैं।

समय यों ही निकलता जायेगा
देश तो सकते में आता जायेगा।

क्या इंसान अपना वचन निभायेगा
और देश के लिये खुलकर आ पायेगा।

शाम,दाम,दंड भेद सब अपनाते हैं आज
क्यों नही बचा पाते हैं भारत माँ की लाज ?

अनिष्ट होते रहते हैं और हम सहते हैं
खड्ग उठाने का समय अब आ गया है।

क्या हम अपना वचन निभायेंगे
देश के लिये खुलकर आ पायेंगे।

बावरी हवा


ऐ हवा, तूँ बावरी है क्या ?
चल देती है यों यदा कदा
ओधड के आगे यों बाल बिखेर
चली आती हैं दौड़ी सुबह सबेर।

क्या दुख है तुझे, चल बता मुझे
दिनभर तूँ काम न करे, सब पूछे
कभी कभी तो तूँ सुबह शाम चले
मन मौजी है तूँ , कहते हैं मनचले।

माना कि तूँ चलती है उष्ण तटीय
सोती है तूँ यहाँ वहाँ बिन तकिये
कांवड़िये रूक जाते है आता जान तुझे
हिला दे उनकी कांवड जाने क्या सूझे।

रात दिन नही समझती है तूँ
चल देती है बिन बताये क्यों
शमशान की तूँ राख उड़ाये
मुर्दों की भी क्यों नींद भगाये।

आकाश में छाये बादल यों भागे
जैसे भागे चौर पुलिस के आगे
साँय साँय की आवाज तूँ करती
कालबेलिये की बीन जैसे फिरती।

बवंडर की तरह तोड़ फोड़ मचाये
जब चाहे तब तूँ मूँह उठा कर आये
सबकी अकल ठिकाने लगाती है क्यों
आनन फ़ानन में जब भी आती है यों।

तूझे इमान नहीं है किसी का
ऐ हवा बता तूँ बावरी है क्या ?
राम भरोसे बस रहते हैं सब
जब भी दिखाये तूँ ये करतब।

उल्फ़त ये तेरी कम नही है
हलके हल्के चले तो ग़म नहीं है
सिंहनाद करके सबको चौंकाती
अलख निरंजन भी तूँ कर जाती।

ये कोई बात सराहनीय है क्या
ऐ हवा बता तूँ बावरी है क्या ?
नाचती गाती जब भी तूँ आती
कभी सरस तो कभी तमतमाती।

जब चाहे तूँ रहे गुनगुनाती
लगता है शायद तूँ शर्माती
रंगीन नहीं है साँवरी है क्या
ऐ हवा, तूँ बावरी है क्या ?

Saturday, 2 October 2021

भारत के दो सच्चे सपूत

2 अक्तूबर के दिन जन्मे

भारत के थे वो अभिन्न अंग।
एक थे गांधी लकूटि संग
आधी धोती था श्वेत रंग।


एक थे लाल बहादुर बृजवासी
नाटी सी थी उनकी क़द काठी।

दोनों थे भारत के सच्चे सपूत
क्या वर्तमान और फिर क्या भूत।

सच्चे थे और अच्छे भी थे वो
अपने प्रण के बडे पकके थे वो।

ठान लिया था कुछ काम करेंगे
विश्वभर मे देश का नाम करेंगे।

एक ने अंग्रेज़ों को ललकारा
अहिंसा का सबको दिया नारा।

अंतरिम संकट को पहचाना
बुन दिया सुदृढ ताना बाना।

बुनियादी ढाँचा मज़बूत किया
गांधी बापू का उप नाम दिया।

महात्मा भी वो थे कहलाये
संपूर्ण जगत में फिर वो छाये।

लाल बहादुर की उपमा देकर
अच्छे अच्छे भी थे अब थर्राये।

महिमा थी उनकी ऐसी कुछ
थे वो कुछ करने के इच्छुक।

सच्चाई से मुख ना मोड़ो
अंग्रेज़ों अब भारत छोड़ो।

सचमुच थे वो बडे महान
जय जवान जय किसान।

यादें जुड़ी हैं दोनों के संग
भारत के थे वो अभिन्न अंग।