हसीन वादियों में रहकर भी
क्यों उदास सा था मेरा दिल
छिपी छिपी सी थी ख़्वाहिशें
मिल न सकी थी तय मंज़िल
उलफत भरी ज़िन्दगी में
बेज़ार थी ज़िन्दगी की वो शाम
चाहकर भी न कह सके
बस यही ज़िन्दगी का नाम
समन्दर सी गमगीन थी वो
हसीन वादियों के बीच
चुहलबाजिया न करती थी
न ही था कोई संगीत
हक़ीक़त तो थी यही
कि तल्ख़ सी थी ज़िन्दगी
बस उलफत तो थी,वही सही
मायूस न हो,यदि न हो कोई दिललगी
आहट न थी वहाँ
यकायक चील की परछाईं
धूप की तिरछी किरणें थी छाई
पहाड़ियों की मनमानी थी वहाँ
रह रह कर आती थी याद
सूना पन सता रहा था
न कोई सुनता खा फ़रियाद
कहने को तो ज़माना था
आइना न दिखाता था कोई
मन था कि मानता न था
धकेल देता था
उस ओर जहाँ न रहता था अपना कोई
दरवाज़े पर मन के दस्तक हुई
सोचा कौन होगा
मन की गहराइयों से आहट हुई
सूनापन था और कौन होगा
वादियों में एक तिलस्म होता है
कूक सुनती है कोयल की
कोई उनकी गूँज सुनता है
इन्हीं वादियों में क्यों सुनसान था दिल
तभी किसी की सरसराहट सुनाई दी
शायद कोई राहगीर होगा
मन की गुशताकिया थी वो
बस उसके मुताबिक़ ही होगा
चैन से क्यों नहीं बैठता ये
सजाता क्यों नहीं महफ़िल
हसीन वादियों में रहकर भी
क्यों उदास था मेरा दिल